Saurabh
"उस की याद आई है साँसो ज़रा आहिस्ता चलो
धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है"

अब क्या पता कि राहत इंदौरी साहब ने ऊपर वाले को कुछ ज़्यादा ही याद कर लिया। या ऊपर वाले को मुशायरे कि महफिल सजाने की बेसब्री थी।

ख़ैर। अपने जाने में भी वो लाखों भक्तों को कुछ पल की खुशियाँ बाँट गए। कहाँ मिलते हैं ऐसे लोग?