ज़मीन पर कुछ लकीरें हैं, जो दिखाई नहीं देतीं।
उन लकीरों के इस पार हमारे बच्चे हैं। जन्मदिन मनाते हैं, pool party attend करते हैं, तोहफ़े बाँटते हैं। उन के स्कूल मे एक छोटा सा हादसा हो जाता है तो लोग ऐसे overreact करते हैं मानो ज़लज़ला आ गया हो।
लकीरों के उस पार उनके बच्चे हैं। मस्जिद की ज़मीन पर असहाय, स्तब्ध, भूखे बैठे। इनके घर उजाड़ दिए जाते हैं, स्कूल बरबाद कर दिए जाते हैं, कॉपी क़िताब जला दिए जाते हैं, मग़र कोई कुछ नहीं पूछता।
सामाजिक न्याय नहीं तो कुछ नहीं। तुम स्कूल बनाओगे, वो तोड़ेंगे। तुम हस्पताल बनाओगे, वो उसमें लाशें भरेंगे। पहले इंसान को इंसान होने का हक़ दो, बराबरी दो। इन लकीरों को मिटाओ। इसके बग़ैर विकास और good governance का कोई मोल नहीं।
उन लकीरों के इस पार हमारे बच्चे हैं। जन्मदिन मनाते हैं, pool party attend करते हैं, तोहफ़े बाँटते हैं। उन के स्कूल मे एक छोटा सा हादसा हो जाता है तो लोग ऐसे overreact करते हैं मानो ज़लज़ला आ गया हो।
लकीरों के उस पार उनके बच्चे हैं। मस्जिद की ज़मीन पर असहाय, स्तब्ध, भूखे बैठे। इनके घर उजाड़ दिए जाते हैं, स्कूल बरबाद कर दिए जाते हैं, कॉपी क़िताब जला दिए जाते हैं, मग़र कोई कुछ नहीं पूछता।
सामाजिक न्याय नहीं तो कुछ नहीं। तुम स्कूल बनाओगे, वो तोड़ेंगे। तुम हस्पताल बनाओगे, वो उसमें लाशें भरेंगे। पहले इंसान को इंसान होने का हक़ दो, बराबरी दो। इन लकीरों को मिटाओ। इसके बग़ैर विकास और good governance का कोई मोल नहीं।