बचपन से ही ‘ष’ और ‘श’ मुझे सताते आए हैं। अकेले इन नालायकों की वजह से मेरी हिंदी भाषा से ख़ुन्नस हो गई थी school में। और अब जानने में यह आता है कि दोनों के उच्चारण में कोई फ़र्क ही नहीं हिंदी में। फ़र्क संस्कृत में होता था। मलतब ष एक legacy अक्षर है। School वाले कहते हैं कि देवनागरी एक ध्वन्यात्मक लिपी है। मगर इन जैसे अक्षरों कि वजह से हम जैसे बच्चों को वर्तनी रटनी पड़ती है।
बकवास। यह लोग ष का ख़तम क्यों नहीं कर देते? हटा दो किताबों से जब उसका कोई मतलब ही नहीं रहा।
बकवास। यह लोग ष का ख़तम क्यों नहीं कर देते? हटा दो किताबों से जब उसका कोई मतलब ही नहीं रहा।