Saurabh
इक दफ़ा वो याद है तुमको
बिन बत्ती जब साइकिल का चालान हुआ था?
हमने कैसे भूखे-प्यासे बेचारों सी एक्टिंग की थी
हवलदार ने उल्टा एक अट्ठनी देकर भेज दिया था
एक चव्वनी मेरी थी
वो भिजवा दो...

सावन के कुछ भीगे भीगे दिन रखे हैं
और इक खत में लिपटी रात पड़ी है
वो रात बुझा दो
और भी कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है
वो भिजवा दो

पतझड़ हैं कुछ
पतझड़ में कुछ पत्तों के गिरने की आहट
कानों में पहनकर लौट आई थी
पतझड़ की वो शाख अभी तक
काँप रही है
वो शाख गिरा दो
मेरा वो सामान लौटा दो

एक अकेली छतरी में जब
आधे आधे भीग रहे थे
आधे सूखे आधे गीले
सूखा तो मैं ले आई थी
गीला मन शायद बिस्तर के पास पड़ा हो
वो भिजवा दो
मेरा वो सामान लौटा दो

एक सौ सोलह चाँद की रातें
एक तुम्हारे काँधे का तिल
गीली मेहँदी की खुशबू
झूठ-मूठ के शिकवे कुछ
झूठ-मूठ के वादे भी सब याद करदूं
सब भिजवा दो
मेरा वो सामान लौटा दो

सब भिजवा दो
मेरा वो सामान लौटा दो

एक इजाज़त देदो बस
जब इनको दफ़नउंगी
मैं भी वहीँ सो जाउंगी

मैं भी वहीँ सो जाउंगी...

🪔 🕯️ जन्म-दिन मुबारक़ हो गुलज़ार साहब 🎈 🎉 🌸 💕
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