Saurabh
राह में कहीं यह जनाब मिल गए। मैंने तुरंत camera निकाला, इजाज़त ली और खेंच ली कुछ तस्वीरें।

फिर मेरे सह यात्री ने बड़े अदब से इनसे इनका हाल पूछा। पता चला यह 1920 में पैदा हुए थे। चालीस साल से यहीं दुकान लगाते हैं। अपने बटुए से निकाल अपना पहचान पत्र भी दिखाया। अपना काम बड़ी ईमानदारी से करते हैं। अपने बारे में और कई रोचक बातें बताईं।

तब मुझे बड़ी शर्म आई। हम शहरी लोग, किसी भी इंसान को, उसकी पूरी शख़्सियत को, उसके चहरे की हर लकीर को, एक character pic में तब्दील कर देते हैं। इनका पूरा वज़ूद मेरे लिए एक क्षणिक Instagram post से ज़्यादा कुछ भी नहीं था।

Posting a phone pic of the gentleman here, out of respect. The camera pics are gone. Hope he reminds us to be more humane when using our equipment. Our "subjects" are people too.