Saurabh
"तुझसे नाराज़ नहीं ज़िदगी, हैरान हूँ मैं।"

कई बार सुनी होगी यह पंक्ति आपने। मगर कितना सच है इसमें। ज़िदगी से नाराज़ या परेशान होकर कुछ हासिल नहीं होता।

पिछले हफ़ते किसी के चले जाने से मैं दुखी था। इस दुख में एक पुराने दोस्त से अरसे बाद गुफ़तगू हुई। बात करके समझ आया कि कुछ लोग ज़िंदगी में एक जगह थम जाते हैं। आगे नहीं बढ़ पाते। अपनी परेशानियों को ना हल कर पाते हैं, ना पीछे छोड़ पाते हैं।

कल एक नए दोस्त से मुलाक़ात हुई। हंसी हंसी में यह बात हुई कि अपनी परेशानियों में उलझ कर रह जाना आजकल एक ट्रेंड हो गया है। ज़िदगी बढ़ते जाने का नाम हैं। ज़िदगी की हैरानियों पर हँसते जाइए तो ज़िदगी खुद-ब-खुद हंसीं हो जाती है।

जब ऐसा सोच लिया तो आज सारा दिन अच्छा गया। सुबह मेरे पसंदीदा अरावली पार्क में गुज़री। बाकी दिन दोस्तों के साथ हंसी खुशी बीता। अब शाम गीत सुन कर काट रहे है।

इस हफ़ते मैंने कई महीनों के बाद पूरा दिन काम किया। थकान हुई। शाम तक फेफड़े थक जाते हैं। मग़र खुशी भी हुई। शायद इसलिए कि काम मेरे शौक का था। कुछ ऐसे शौक भी पूरे किए जिनके बारे में सोचना तक छोड़ दिया था। उसके लिए दोस्तों और ज़िदगी का शुक्रिया।

सुनने बैठे थे "हुज़ूर इस कदर भी ना..."। उस गीत के बाद spotify ने खुद ही यह गीत सुना दिया, और ख़याल इधर उधर निकल गया। शुभ रात्री।
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