कल मेरी अपने मोहल्ले के डाकिए से मुलाकात हुई।
मैं: अरे आप डाक बांट रहे हो! तो नोट कौन बांटेगा?
डाकिया: अरे उस सब के लिए और लोग हैं भाई। जब पैसा आएगा, वह बदलेंगे। मैंने डाक न बांटीं तो कैसे चलेगा?
मैं: आएगा मतलब?
डाकिया: अरे डाकघर में कोई ख़ज़ाना थोड़े ही है। हमारे पास भी पैसा बैंक से आता है। अभी बैंकों में पैसा नहीं है तो हमें कौन देगा?
आज आस पास के बैंकों ने लोगों को निराश किया। कल डाकखाने खुले तो हैं, मगर वहां मिलेगा क्या?
मैं: अरे आप डाक बांट रहे हो! तो नोट कौन बांटेगा?
डाकिया: अरे उस सब के लिए और लोग हैं भाई। जब पैसा आएगा, वह बदलेंगे। मैंने डाक न बांटीं तो कैसे चलेगा?
मैं: आएगा मतलब?
डाकिया: अरे डाकघर में कोई ख़ज़ाना थोड़े ही है। हमारे पास भी पैसा बैंक से आता है। अभी बैंकों में पैसा नहीं है तो हमें कौन देगा?
आज आस पास के बैंकों ने लोगों को निराश किया। कल डाकखाने खुले तो हैं, मगर वहां मिलेगा क्या?